नई दिल्ली। अमेरिका की ओर से भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के फैसले को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही कुछ दिनों के लिए टाल दिया है, लेकिन इसे लेकर भारत में प्रतिक्रिया हो रही है। स्वदेशी को बढ़ावा देने की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इसके बाद अब यह मुद्दा केवल कूटनीतिक और आर्थिक ही नहीं बल्कि वैचारिक बहस का भी केंद्र बन गया है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने 19 और 20 अगस्त को दिल्ली में एक दो दिवसीय विशेष बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। इस बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले, सभी सह-सरकार्यवाह, शीर्ष अधिकारी और संघ के आर्थिक क्षेत्र से जुड़े संगठन शामिल होंगे।
क्यों बुलाई गई है बैठक?
अमेरिका ने हाल ही में भारत से आयातित कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। भारत ने इस फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन वाशिंगटन ने न तो अपने निर्णय को वापस लिया और न ही उस पर किसी तरह के पुनर्विचार का संकेत दिया। इस टैरिफ नीति से न केवल भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ेगा बल्कि छोटे उद्योगों और कृषि उत्पादकों की कमर भी टूट सकती है। संघ का मानना है कि यह केवल आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता की राह में एक बाधा है। इसी पृष्ठभूमि में आरएसएस ने अपने आर्थिक समूह और सहयोगी संगठनों के साथ व्यापक रणनीति पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई है।
बैठक में कौन होंगे शामिल?
इस बैठक की खासियत यह है कि इसमें संघ के वे शीर्ष पदाधिकारी शामिल होंगे, जो आमतौर पर केवल राष्ट्रीय महत्व के मामलों में ही एकत्र होते हैं।
मोहन भागवत (सरसंघचालक)
दत्तात्रेय होसबोले (सरकार्यवाह)
सभी छह सह-सरकार्यवाह
विभिन्न अखिल भारतीय अधिकारी
इसके अलावा संघ के आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले प्रमुख संगठन जैसे –
स्वदेशी जागरण मंच
भारतीय मजदूर संघ
भारतीय किसान संघ
लघु उद्योग भारती
सहकार भारती के प्रतिनिधि भी इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा हो सकते हैं। एक अनुमान है कि करीब 50 से 60 प्रमुख पदाधिकारी संघ इस चिंतन बैठक में भाग लेंगे।
बैठक का मुख्य एजेंडा
अमेरिकी टैरिफ नीति का मूल्यांकन – इसका सीधा असर भारतीय उद्योग, कृषि और व्यापार पर कैसे पड़ेगा, इस पर विस्तृत चर्चा।
आर्थिक रणनीति का निर्माण – आयात-निर्यात नीति, स्वदेशी उत्पादन और घरेलू बाजार की मजबूती पर विचार।
सहयोगी संगठनों का योगदान – मजदूर, किसान और छोटे उद्योगों से जुड़े संघटन इस संकट से निपटने के लिए अपने सुझाव देंगे।
राजनीतिक विमर्श – बैठक में यह संभावना भी जताई जा रही है कि बीजेपी और केंद्र सरकार के कुछ वरिष्ठ नेता इसमें शामिल हो सकते हैं ताकि संघ और सरकार मिलकर साझा रणनीति बना सकें।
संघ का अमेरिका पर तीखा हमला
संघ ने हाल ही में अपने मुखपत्र में अमेरिकी नीति को लेकर तीखी आलोचना की थी। लेख में कहा गया था कि अमेरिका स्वतंत्रता और लोकतंत्र का मसीहा बनने का दावा करता है, लेकिन वास्तविकता में वह तानाशाही और आतंकवाद को बढ़ावा देता है। टैरिफ और व्यापार युद्ध आज संप्रभुता पर हमला करने और उसे कमजोर करने का नया हथियार बन गए हैं। भारत के भीतर कुछ लोग अमेरिकी नीति के समर्थन में खड़े होकर नव-औपनिवेशिक एजेंट की तरह कार्य कर रहे हैं। इस बयानबाजी से स्पष्ट है कि आरएसएस इस मामले को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता के मुद्दे से जोड़कर देख रहा है।
क्या सरकार पर बढ़ेगा दबाव?
संघ की इस बैठक से यह भी संदेश जा रहा है कि केंद्र सरकार पर टैरिफ विवाद में आक्रामक रुख अपनाने का दबाव बढ़ सकता है। बीजेपी और सरकार के नेताओं की संभावित भागीदारी यह संकेत देती है कि इस मुद्दे पर पार्टी और संघ के बीच समन्वय जरूरी है।विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बैठक से कोई ठोस प्रस्ताव निकलता है तो सरकार को अमेरिकी नीति के खिलाफ कड़ा कदम उठाना पड़ सकता है।
किसानों और उद्योगपतियों के लिए चिंता
अमेरिकी टैरिफ का सबसे बड़ा असर उन उत्पादों पर पड़ रहा है जिन पर भारत की निर्यात निर्भरता अधिक है।
कृषि उत्पाद: चावल, चीनी और मसालों पर असर।
छोटे उद्योग: टेक्सटाइल, लेदर और हैंडीक्राफ्ट निर्यात को भारी नुकसान।
आईटी और सर्विस सेक्टर पर भी परोक्ष प्रभाव।
ऐसे में संघ की यह बैठक किसानों, मजदूरों और छोटे उद्योगों की आवाज को सामने लाने का भी मंच बनेगी।
संघ की आर्थिक सोच
आरएसएस लंबे समय से स्वदेशी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की वकालत करता रहा है। स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन लगातार विदेशी आयात और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नीतियों का विरोध करते रहे हैं। इस बैठक के जरिए संघ यह संदेश भी देना चाहता है कि आर्थिक आज़ादी, राजनीतिक स्वतंत्रता जितनी ही अहम है। अमेरिका के टैरिफ फैसले ने भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यह केवल एक आर्थिक मसला नहीं बल्कि रणनीतिक और वैचारिक बहस का मुद्दा बन चुका है। इसी कारण आरएसएस ने इतनी जल्दबाजी में उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है। 19 और 20 अगस्त को होने वाली यह बैठक न केवल अमेरिकी नीति पर संघ का रुख तय करेगी बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि आने वाले समय में सरकार किस तरह की आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति अपनाती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बैठक से निकलने वाले निर्णयों का असर आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका रिश्तों और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों पर देखने को मिलेगा। (प्रकाश कुमार पांडेय)





