भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 के बाद मिली अपेक्षाकृत निराशा को हरियाणा और इसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करके दूर किया, लेकिन अब भी उसे बिहार विधानसभा चुनाव में परीक्षा के दौर से गुजारना होगा। खासतौर पर बिहार की राजनीति के पल-पल बदलते रंग और मिजाज को देखते हुए माना जा रहा है कि यदि साल 2025 के अंत तक कोई उलटफेर हो जाए तो वह भी हैरानी भरा नहीं होगा।
- हरियाणा और महाराष्ट्र में दूर की भाजपा ने लोकसभा चुनाव की निराशा
- हरियाणा और इसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल
- अब उसे बिहार विधानसभा चुनाव में परीक्षा के दौर से गुजारना होगा
- बिहार की राजनीति के पल-पल बदलते रंग और मिजाज
- 2025 के अंत तक कोई उलटफेर हो जाए तो वह भी हैरानी भरा नहीं होगी
भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार 2024 में तीसरा बार लगातार सत्ता में आई थी, लेकिन अब उसके लिए साल 2025 कई चुनौतियों से भरा होगा। बहुत कुछ तय करने वाला यह साल होगा। भाजपा को लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता जरूर हासिल हो गई, लेकिन अपने दम पर लोकसभा की 240 सीटें ही मिल पाने के चलते वह केन्द्र सत्ता से चूक गई। ऐसी स्थिति में उसके सामने जेडीयू की 12 और लोकजन शक्ति पार्टी की 5 लोकसभा सीटें अहम हैं। वहीं आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी टीडीपी की 14 लोकसभा सीट और एकनाथ शिंदे गुट की 9 लोकसभा सीटों को मिलाकर 272 के आंकड़े को बनाए रखने के लिए अहम हैं। भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 के बाद पार्टी में आई निराशा को हरियाणा और इसके बाद महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में बड़ी विजय हासिल कर दूर तो कर लिया है, लेकिन अब भी उसे बिहार के चुनाव में परीक्षा के दौर से गुजरना बाकी है। खासतौर पर बिहार में पल-पल बदलते राजनीति के मिजाज को देखते हुए माना जा रहा है कि यदि साल 2025 के अंत तक कोई उलटफेर हो जाए तो वह भी हैरानी भरा नहीं होगा।
बिहार में नीतीश कुमार लगभग दो दशक से ऐसी ताकत के रुप में स्थापित हैं। जिनकी इर्दगिर्द सत्ता घूमती है। चाहे सरकार आरजेडी की हो या उसके सहयोग से बने। चाहे फिर भाजपा के साथ बनी हो। सीएम नीतीश कुमार ही रहे हैं। ऐसे में जब अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्मजयंती कार्यक्रम के दौरान डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि पार्टी की बिहार में अपने दम पर सरकार होना ही अटल जी के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ऐसे में यह बात जेडीयू को भी चुभ गई। इसके बाद फिर जो पोस्टर जेडीयू की ओर से लगाए थे, उससे भी साफ हो गया कि बिहार में नीतीश कुमार के नाम पर किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं होगा।
जेडीयू की ओर से पोस्टर में साफ लिखा- ‘बात जब बिहार की हो तो चेहरा केवल नीतीश कुमार का हो। इस तरह बिहार विधानसभा चुनाव से महीनों पहले ही चुनावी रस्साकशी शुरू हो चुकी है। इसके बीच भी बीजेपी पर अब दबाव होगा कि वह बिहार ईकाइ के नेताओं को साधे रखे। सीएम नीतीश कुमार से हार्ड बारगेनिंग को भी कर ले। दोनों पार्टियों के लिए चुनाव से पहले सीटों का बंटवारा भी इस बार उतना आसान नहीं होगा। इसके अतिरिक्त चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे बिहार के बड़े नेताओं को भी साधना बीजेपी के लिए कम चुनौती पूर्ण नहीं होगा। दरअसल बिहार के चुनावी नतीजे दिल्ली तक असर डाल सकते हैं। इस राज्य में एनडीए को यदि चुनाव में हार झेलनी पड़ी तो फिर भाजपा और जेडीयू के बीच खींचतान शुरु होते दिख सकती है। जिसका सीधा असर दिल्ली तक दिखेगा।
(प्रकाश कुमार पांडेय)





