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Home शहर और राज्य उत्तर प्रदेश

अयोध्या …जिसने वैभव भी देखा और राम के वनवास का दर्द भी झेला..अब राम के लिए सजा धाम

DigitalDesk by DigitalDesk
January 10, 2024
in उत्तर प्रदेश, धर्म, मुख्य समाचार, लखनऊ, स्पेशल
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Uttar Pradesh Ayodhya Ram Janmabhoomi Ram Mandir Pran Pratistha PM Narendra Modi
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अयोध्या ने कई बल प्रताप बलिदान देखा। तो दुखों का पहाड़ भी झेला। ऋषितुल्य राजा मांधाता का साम्राज्य देखा तो राजा हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता और राजपाठ के त्याग को देखा राम को वनवास जाते देखा। अयोध्या की तुलना स्वर्ग के सुखों से की गई तो दुखों का भी कोई पारावार नहीं रहा। यहां राजा दशरथ का पुत्र वियोग में प्राण त्यागना हो या भरत का सिंहासन छोड़कर पादुका पूजन हो। सब कुछ आज भी अयोध्या की आंखों में झिलमिलाता है। लक्ष्मण की 14 वर्षों की सेवा हो या उर्मिला का विरह ये सब कुछ सिरहन पैदा करने वाला है।

  • अयोध्या ने कई बल प्रताप बलिदान देखा…
  • …तो दुखों का पहाड़ भी झेला
  • अयोध्या ने देखी राजा हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता
  • ऋषितुल्य राजा मांधाता का साम्राज्य देखा
  • राजपाठ के त्याग को देखा,राम को वनवास जाते देखा
  • राज्याभिषेक की बेला में राम को वनवास जाते देखा
  • अयोध्या ने देखा कैकई का हठ
  • राजा दशरथ का पुत्र वियोग में प्राण त्यागना भी देखा
  • वलकल पहनकर गये राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर लौटते देखा
  • अयोध्या ने देखा कलयुग में त्रेतायुग की घटना
  • अयोध्या ने अपने बेटे राम को तिरपाल के नीचे देखा
  • तिरपाल के नीचे बैठे बेटे राम को निहारती रही अयोध्या
  • रक्तपात भी अयोध्या ने चुपचाप सहा, धैर्य नहीं खोया
  • आज अयोध्या ही नहीं उसकी सखी सरयू भी है प्रसन्न

राजा दशरथ बड़े पराक्रमी थे। उनके चार पुत्रों के जन्म पर महीनों जश्न हुआ। आगे चलकर राजा जनक के यहां स्वयंवर में राम ने धनुष तोड़ा और सीता से विवाह हुआ। विवाह के बाद राम का राज्याभिषेक भी होने वाला था लेकिन कैकई के हठ के कारण राम को वनवास मिला। राम का वनगमन आज के संदर्भों में भी कई शिक्षा देता है। भाइयों का प्रेम देखिए जिस भरत के लिए कैकई ने राम का वनवास मांगा। बाद में उन्हीं भरत ने सिंहासन को छोड़कर राम की चरण पादुका के निर्देशन पर राजपाठ किया। कहते हैं अयोध्या कभी हारती नहीं लेकिन हकीकत है कि वह भावनात्मक रूप से हार गई थी। एक बार नहीं बल्कि कई बार, नहीं, अचंभित मत होना आप, वह झूठ नहीं बोल रही बल्कि सच कह रही है। सबसे पहले अयोध्या की भावनाओं पर त्रेतायुग में चोट हुई थी। जब उसके आंगन के सबसे बड़े बेटे राम को वनवास मिला था और वो आदर्श पुत्र बिना किसी शिकायत के बिना कुछ कहे बिना कुछ मांगे अपने पिता की आज्ञा का पालन करने निकल पड़ा और अयोध्या अभागिन जिसे वो अपनी जन्मभूमि के रूप में नहीं बल्कि अपनी मां मानता था। वह ऐसी मां जो अपने उस बेटे को रोक ना सकी और वो जिसे महलों में होना था वो जंगल जंगल भटकने के लिए चला गया। काश काश अयोध्या उस दिन राम को उसे रोक पाती, लेकिन ना जाने क्यों रोक ना सकी 14 वर्षो तक राजमहल ही नहीं। राम की इस जन्मभूमि अयोध्या ने भी अपने पुत्र राम की प्रतीक्षा की थी। अयोध्या की भी पलकें भीग जाती थी। राम जब लौटे राजा भी बने उसी दरबार में लौटे जहां से वो युवराज एक राजवस्त्रों को त्यागकर वलकल पहनकर गया था। लौटा तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर। असत्य और अनीति को हराकर, लेकिन अयोध्या को क्या पता था त्रेतायुग की वो घटना फिर से सामने आएगी। उसकी ही आंखों के सामने उसके इस बेटे को तिरपाल के नीचे रहना पड़ा। एक बार फिर वो राजमहल से दूर हुआ, और अयोध्या कुछ ना कर सकी। वो रामलला जो चतुरंगी सेना का नायक था। उसे पहरे में रहना पड़ा हर पल किसी अनहोनी की आशंका के बीच वो वर्षों रहा। अयोध्या तिरपाल के नीचे बैठे अपने बेटे राम को निहारती रही देखती रही। लेकिन कुछ कर ना सकी, और इस तरह उसके अंतस की भावनाएं हर रोज़ हारती रहीं। वह बस प्रार्थना करती रही कि वो दिन आए जब उसके बेटे राम को उसका धाम मिले लेकिन इस देश की सियासत ने अपने स्वार्थ के लिए खूब रोड़े अटकाए और उस दिन तो मैं अंदर से टूट गई जब उसके राम के लिए आए लोगों के साथ हुए रक्तपात से अयोध्या की छाती रक्तरंजित हो गई। ये भी अयोध्या ने चुपचाप सहा, धैर्य नहीं खोया।

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सियासत ने किया अयोध्या और उसके बेटे का अपमान

यह वहीं अयोध्या है जिसने आक्रोश भी देखा, अवसाद भी देखा और आंदोलन भी देखे। लेकिन उसे क्या पता था की अभी और अपमान होना बाकी था। इस देश की सियासत ने उसके ही बेटे के जन्म का प्रमाण तक मांगा। अयोध्या के उस बेटे के अस्तित्व तक पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए। यकीन मानिए उस दिन तो अयोध्या के आंसू रुके ही नहीं। वह अपने ही मन से सवाल करती रही की आखिर कब तक बार बार उसकी ममता का यूं ही अपमान होता रहेगा। किसी मां से उसके बेटे के जन्म का प्रमाण क्या ये सियासत इतनी निष्ठुर होती है। अयोध्या की आंखों के आज भी आंसू हैं लेकिन आज ये आंसू खुशियों के हैं क्योंकि आज उसके राम का धाम बन गया है। अब रामलला अपने भव्य धाम में विराजेंगे। अध्योध्या की ये बूढ़ी आंखें आज भीगी हैं कि उसके राम को अब कोई तकलीफ नहीं होगी। उसके राम अब उसके पास रहेंगे। कोई उसे उसकी इस जन्मभूमि मां से अलग नहीं कर पाएगा। आज अयोध्या ही नहीं उसकी सखी सरयू नदी भी प्रसन्न है। वही सरयू जिसका पानी बलिदानों से लाल हुआ था ना आज उसकी लहरें भी खुशी से अपने राम का स्वागत कर रही हैं। सारे घाट मुस्कुरा रहे हैं और अयोध्या सबके स्वागत में खड़ी है। आओ आओ राम को निहारो और बधाइयां गाओ मंगल गीत गाओ उसका बेटा आ रहा है। उसका राम आ रहा है।

आज अयोध्या वर्षों के बाद मुस्कुरा रही है

ये कहानी अयोध्या की है। अयोध्या, अजोध्या कहिए या अवध। पौराणिक कथाओं में अयोध्या सबसे प्राचीन और पवित्र मानी जाने वाली 7 नगरियों में सबसे पहली है। ये 7 नगरी हैं अयोध्या, मथुरा, काशी, माया यानि हरिद्वार, कांची, अवंतिका यानी उज्जैन और द्वारका। अयोध्या का सबसे पहला वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। इस वेद में अयोध्या को देवताओं की नगरी कहा गया है।

आठ चक्र और 9 द्वारों वाली अयोध्या को देवों की पुरी कहा जाता है। उसमें प्रकाश वाला कोष है, जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है। अयोध्या को ऐसी नगरी बताया गया है। जिसे शत्रु जीत न सके। अयोध्या को साकेत भी कहा गया। साकेत यानि स्वर्ग के समान। अयोध्या जहां राम का जन्म हुआ। अयोध्या जो इक्ष्वाकु वंश की राजधानी हुआ करती थी। ब्रह्मा के मानस पुत्र मनु ने अयोध्या की स्थापना की। कहा जाता है कि अयोध्या को भगवान विष्णु की सलाह पर स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा की देखरेख में हुआ था।

अयोध्या ही थी भारतवर्ष की राजधानी

स्कंद पुराण के मुताबिक अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे। इनमें ज्य़ेष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया। पहले अयोध्या ही भारतवर्ष की राजधानी हुआ करती थी बाद में हस्तिनापुर हुई। इक्ष्वाकु के 3 पुत्र थे कुक्षि निमि और दंडक। कुशि कुल में भरत से आगे सगर, भगीरथ, ककुत्स्थ, रघु, अंबरीष, नहुष, ययाति, नाभाग, अज, दशरथ और श्री राम हुए। इन सभी ने अयोध्या पर राज किया। पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ियों में कई यशस्वी राजा हुए हैं। भगीरथ के पौत्र रघु बड़े ही पराक्रमी हुए और उन्हीं के नाम पर इक्ष्वाकु वंश का नाम आगे चलकर रघुकुल या रघुवंश पड़ा था।

अयोध्या सिर्फ शहर नहीं बल्कि एक समदर्शी विचार है

अयोध्या सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि एक समदर्शी विचार है…अयोध्या भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। अयोध्या ने कभी जाति को महत्व नहीं दिया। वहां आचरण श्रेष्ठ है, जाति नहीं इसीलिए शबरी, निषादराज ये राम के वृहद परिवार के सदस्य हैं। अयोध्या वो है जो निराश्रितों को आश्रय देती है। राम जिस धर्म, मर्यादा, विनय और शीलता के लिए जाने जाते हैं। उसकी जननी अयोध्या है। जब रावण का वध करके प्रभु श्री राम ने विजय हासिल की। तब लक्ष्मण ने कहा कि भैया आप लंका के विजेता हैं तो लंका पर तो आपका अधिकार है। तब प्रभु ने कहा था कि अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ यानी हे लक्ष्मण, होगी लंका सोने की लेकिन ये जो सरयू किनारे मेरी जन्मभूमि है। जहां मैं पैदा हुआ, वो मेरी मातृभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़ कर है। अयोध्या पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणास्थल और अब मंदिर के निर्माण से इसे और विस्तार मिलेगा। इतिहास में अयोध्या राम की नगरी रही है। अयोध्या हजारों सालों से सभ्यताओं के बनने और बिगड़ने की साक्षी रही है। अयोध्या ने सभी को स्वीकारा है। हर मत और संप्रदाय का रिश्ता अयोध्या से रहा है। जैन संप्रदाय के 5 तीर्थंकरों का रिश्ता अयोध्या से रहा है। बुद्ध ने अपने जीवन का लंबा हिस्सा करीब 16 वर्ष अयोध्या में ही बिताए। अयोध्या सबकी रही है। अयोध्या ने सबको अपनी ओर खींचा है। अयोध्या के गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में गुरुनानक देव, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविन्द सिंह जी ने ब्रह्मकुंड में ध्यान किया था। पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि यहीं पर ब्रह्मा जी ने तपस्या की थी। इस कारण इसका नाम ब्रह्मकुंड पड़ा। अयोध्या ठुकराती नहीं है अयोध्या अपनाती है। कोई भी धर्म हो, कोई भी मत हो, कोई भी संप्रदाय हो अयोध्या ने हर किसी का स्वागत किया है। अयोध्या निराश्रितों को आश्रय देती है। अयोध्या ही रामराज्य की अवधारणा की प्रतीक है।

त्रेतायुग के समान ही अलौकिक नजर आ रही अयोध्या

आज उन्हीं अयोध्या जी में भगवान राम का भव्य मंदिर बन गया है। वो धाम जिसके लिए 500 वर्षों तक इंतजार किया गया। अयोध्या ने प्रभु राम से 2 बार वियोग देखा। पहली बार जब उन्हें 14 वर्षों का वनवास मिला और दूसरी बार करीब 500 वर्षों तक प्रभु अपने ही घर में तिरपाल में रहे लेकिन अब प्रभु का धाम बन चुका है। वनवास सिर्फ राम को नहीं बल्कि अयोध्या को भी मिला। अयोध्या वो है जिसने अपने आंगन में साक्षात परमब्रह्म को घुटनों के बल चलते देखा। काग के पीछे भागते रूठते रोते रिझाते देखा। अयोध्या सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही। सूर्यवंश की 44 पीढ़ियों के उत्थान और अवसान की साक्षी अयोध्या रही। जिन राम ने अहिल्या की प्रतीक्षा सुफल की। शबरी की प्रतीक्षा अभीष्टप्रद की। वो आज अयोध्या की प्रतीक्षा को प्रतिसाद दे रहे हैं। अयोध्या वो है जिसके द्वार पर खुद बजरंगबली विराजमान हो वो अयोध्या कितनी खास होगी ये आप खुद समझ सकते हैं। आज उस अयोध्या की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। आज अयोध्या त्रेतायुग के समान ही अलौकिक नजर आ रही है।

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