1. अखिलेश के टिकट कटेंगे, ओवैसी मौका देंगे
यूपी की सियासत में 2027 से पहले मुस्लिम वोटों को लेकर नई जंग दिखाई दे रही है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का फोकस अब उन मुस्लिम नेताओं पर है, जिन्हें समाजवादी पार्टी से टिकट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन आखिरी वक्त में टिकट कट सकता है। AIMIM ऐसे नेताओं को अपने टिकट पर मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है। यानी अखिलेश यादव के लिए सिर्फ उम्मीदवार चुनने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि टिकट कटने के बाद नाराज नेताओं को संभालना भी बड़ा सवाल होगा।
2. 200 सीटों का ऐलान, निशाने पर मुस्लिम बहुल सीटें
ओवैसी ने गठबंधन को लेकर अपनी डेडलाइन खत्म होने के बाद अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी तेज कर दी है। पार्टी करीब 200 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। इनमें करीब 100 मुस्लिम बहुल सीटों पर खास फोकस रहेगा। AIMIM की रणनीति सिर्फ संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसे उम्मीदवार तलाशने की है जिनका अपने इलाके में व्यक्तिगत प्रभाव और जमीनी पकड़ हो।
3. 2022 का वोट कटवा मॉडल फिर तैयार
2022 में AIMIM करीब 97 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन कई सीटों पर उसे मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे। ऐसे में AIMIM भले ही सीट जीतने की स्थिति में न हो, लेकिन वह मुकाबले का गणित जरूर बदल सकती है। खासकर उन सीटों पर जहां सपा और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, कुछ हजार वोटों का बंटवारा भी नतीजे पर असर डाल सकता है।
4. पूर्वांचल से पश्चिम तक ओवैसी का मिशन
ओवैसी का चुनावी दौरा भी उनकी रणनीति को साफ कर रहा है। श्रावस्ती, आजमगढ़, रामपुर, कैराना और मेरठ जैसे इलाकों में सभाओं का कार्यक्रम बताता है कि AIMIM पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। खास बात यह है कि इनमें कई इलाके सपा की मजबूत राजनीतिक जमीन माने जाते हैं। इसलिए ओवैसी की सक्रियता सीधे तौर पर सपा के वोट बैंक और स्थानीय नेताओं के समीकरण को चुनौती दे सकती है।
5. सपा-कांग्रेस से दूरी, छोटे दलों से नजदीकी
अगर सपा-कांग्रेस के साथ समझौता नहीं होता है तो ओवैसी छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ नया मोर्चा बनाने की कोशिश कर सकते हैं। आजाद समाज पार्टी, पीस पार्टी और राष्ट्रीय उलमा काउंसिल जैसे दल संभावित विकल्प हो सकते हैं। ओवैसी का संदेश भी साफ है कि मुस्लिम वोटों को किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक मानकर नहीं चला जा सकता। यही संदेश 2027 में सपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
असल लड़ाई सीटों की संख्या से ज्यादा वोटों के बिखराव की है। AIMIM अगर मजबूत स्थानीय चेहरों को अपने साथ जोड़ने में सफल होती है, तो वह खुद कितनी सीटें जीतेगी, यह अलग सवाल है। लेकिन सपा के सामने उन सीटों पर मुश्किल जरूर बढ़ सकती है, जहां जीत-हार का अंतर पहले से कम रहा है। 2027 में इसलिए ओवैसी की भूमिका सीट जीतने से ज्यादा सपा के समीकरण बिगाड़ने वाले खिलाड़ी के रूप में महत्वपूर्ण हो सकती है।





